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advet charan gannayak interview, theinterview.in
ग्वालियर.

 मूर्तिकला में महारथ हासिल करने के लिए उसे महसूस करना होता है उसके लिए डेडिकेशन करना पड़ता है. पुतले या स्कल्पचर बनाने भर से कोई आर्टिस्ट नहीं बन जाता. बल्कि यह तो एक तरह की साधना है जिसके लिए हमें तप करना पड़ता है. यह बात प्रसिद्ध मूर्तिकार एवं महानिदेशक राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्राहलय, अद्वैत चरण गणनायक ने द इंटरव्यू से बातचीत के दौरान कही.

इमेजिनेशन की कमी

मूर्तिकला में सबसे महत्वपूर्ण जो है वह है इमेजिनेशन. बिना इसके
आप किसी की मूर्ति नहीं बना सकते, हां पुतला जरूर बन सकता है.
लेकिन दुख है कि आज के यूथ में इमेनिजेशन की बहुत कमी है.
इसका कारण है कि उन्हें कम समय में अधिक चाहिए होता है.
उदाहरण के लिए मुझे जब महात्मा गांधी की प्रतिमा बनने के लिए
कहा गया तो मैंने ६ माह तक रिसर्च की. वे जहां जहां रहे वहां गया
और उन्हें महसूस करने की कोशिश की. इसके बाद ही मूर्ति
बनाई. लेकिन आज के युवाओं में इमेजिनेशन की बहुत कमी दिखाई देती है.

इंटरेक्शन बहुत जरूरी

इमेजिनेशन कमजोर पडऩे के पीछे सबसे बड़ा कारण है कि हमारे
यहां कॉलेज हों या फिर विवि सभी जगहों पर इंटरेक्शन की कमी
है. यूथ का जो संवाद नेचर, एटमॉसफीयर के साथ होना चाहिए वह नहीं है.

पत्थर को फील करना जरूरी

मूर्ति बनाने से पहले पत्थर को दोस्त बनाना पड़ता है उसे फील
करना पड़ता है. पत्थर भी फीमेल और मेल होते हैं. पत्थर की खासियत
देखिए कि फीमेल पत्थर पर मेल मूर्ति तैयार होती हैं और मेल पर फीमेल.

लोग कर रहे हैं नकल

भारतीय मूर्ति कला का इतिहास बहुत ही प्राचीन है. हमने कभी किसी
की नकल नहीं की. हमेशा इमेजिनेशन के जरिए ही काम
किया. लेकिन आज लोग नकल कर रहे हैं. ये हमारी कला नहीं है
बल्कि विदेशी कला है.

टेक्नोलॉजी ने बना दिया व्यवसाई

टेक्नोलॉजी के आने से कलाकारों को फायदा तो हुआ लेकिन
नुकसान भी बहुत हुआ. खासकर यूथ टेक्नोलॉजी के जरिए मूर्ति
निर्माण करने लगे जिससे उनकी इमेजिनेशन कम हो गई. यहां तक
कि तकनीकी ने कलाकार गढऩे के बजाए व्यवसायी बना दिए हैं.

 

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